May 4, 2021 · कविता
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भेद मन के खोल बादल।

भेद मन के खोल बादल।

कौन है जिसकी झलक से ये धरा आक्रांत होती।
लेके आता जल कहाँ से जिससे दुनिया शांत होती।
रख न अपने तक इसे तू कूट ये अनमोल बादल।

भेद मन के खोल बादल।

मांगता है छीनता है या परिश्रम से किया है।
यह सुधा सम जल बता तो किस सरोवर से लिया है।
सागरों का जल तो होता है नमक का घोल बादल।

भेद मन के खोल बादल।

तरल अंतर में कड़कती दामिनी का वास कैसे।
रूप है काला तुम्हारा चमक इतनी साफ कैसे।
सरल विचरण है तुम्हारा होके भी बेडौल बादल।

भेद मन के खोल बादल।
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कुमारकलहन्स, बोइसर,पालघर।

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Kumar Kalhans
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