भूल गये इस दौर में, शायद हम तहजीब(दोहे)

मिले देखने आजकल ,खबरें कई अजीब !
भूल गये इस दौर में, शायद हम तहजीब !!

चेहरे पर आती नही,. ..कभी झुर्रियाँ आप !
छिपी तजुर्बों की हमे,दिखे अनगिनत छाप !!

देशभक्ति पर पड़ रही, राजनीति की गाज !
नारे हिन्दुस्तान के, ……अर्थ नए पर आज !!

जुडे मीडिया से सदा,राजनीति के तार!
वही दिखाता है हमे,.जो चाहे सरकार !!

उसने दरिया कर लिया,जीवन का हर पार !
संस्कारों की नाव पर, ..वो जो हुआ सवार !!

रोके से रुकते नहीं, कभी कभी जज्बात !
बनकर आँसू आँख से , बहती है हर बात !!

मेरे मुझको छोड़कर,चले गए सब ख़ास !
आई मेरी मुफ़लिसी,उन्हें न शायद रास !!

कैसे कोई किस तरह,इसका करे इलाज !
तोडें अपने ही अगर, .अपने बने रिवाज !!

सींचा रह रह कर सदा जातिवाद का वृक्ष !
राजनीति इस कृत्य में , .रही हमेशा दक्ष !!

राजनीति का एक ही, लगता अब तो काम !
इक दूजे पर थोपना,…..अपने पाप तमाम !!

आरक्षण की आग मे , रहे रोटियाँ सेक !
दिखें सियासत मे हमें,.ऐसे धूर्त अनेक !!

हिंसा से सुधरे नही, कभी मित्र हालात !
भूल गये इस दौर मे,हम शायद ये बात !!
रमेश शर्मा

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