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भूले माँ का प्यार

परदेशी सुत हो गये , भूले माँ का प्यार ।
हाथ जोड़ विनती करे , खुशी पुत्र परिवार।
गीले में सोती रही, रखा लाल का ख्याल ।
अपनापन दिल में बसा, भूल गया बस लाल ।
श्वेत केश बिखरे वसन, चौथेपन की ओर ।
जिनको पाला शौक से , छोड़ बसा उस छोर ।
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लाल देरी हुई खोजती माँ डगर ।
हाथ रोटी लिए देखती माँडगर।
भोर होने लगी चाँद जाने लगा-
सूर्य भूला नगर देखती माँ डगर।
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मापनी १६/१३
फूलो की घाटी में दिखती, नफ़रत पत्थरबाज में।
दौलत खातिर माँ को बेचे , काफ़िर कायर नाज़ में।
हवशी दौलत मुर्ग मुसल्लम, नलायक औलाद हैं –
भौमासुर से धरती काँपे , त्राहि- त्राहि आवाज़ में ।
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माँ ममता मंदिर हुई , स्नेह सुखद आशीष ।
जाकी जैसी भावना , तस मति दें वागीश ।
तस मति दें वागीश , देव दानव मन रमता ।
धन्य धन्य गुण भाव, कहे जग माँ की ममता ।
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मापनी – २१२ २१२ २१२ २१२
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लाल को देखकर माँ खुशी हो गयी |
प्राण कैसे रहे दिल जमी हो गयी |
पौध फलने लगे , ज्ञान की साख पे |
माँ दिखी इक झलक बतकही हो गयी |
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[बतकही -बातचीत]
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हे मातुतेरा महाप्रयाण, सुखद दिली कुछ यादें !
आनन्दम चरणारज़वंदन, विह्वल पुलकित वादें !
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प्रथम नमन् माँ के चरण , जन्मदायनी त्याग ।
लाल प्रेम नित दुख सहे , कहे अहो मम भाग।।
गीले में तू सो गयी , कैसा प्रिय अनुराग ।
बाल प्रेम मृदु गंग जल, तीरथ राज प्रयाग ।।
कभी नहीं देखी चुनर, माटी ममता कीच ।
तनमन से पुलकित हुई ,मातु बाल के बीच।। ।।
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माँ तेरे आँचल की ममता बह गयी !
मनभावना नलिनी जलज बन रह गयी !

राजकिशोर मिश्र ‘राज’ प्रतापगढ़ी

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राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी
राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी
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