Reading time: 1 minute

भुलाता जा रहा है सादगी को

भुलाता जा रहा है सादगी को
ये क्या होने लगा है आदमी को

जिधर देखो अँधेरा ही अँधेरा
चलो हम ढूँढ लाये रोशनी को

उठाता हाथ है औरत पे जो भी
वो गाली दे रहा मर्दानगी को

सभी को सादगी अच्छी लगे है
नहीं चाहे कोई आवारगी को

फ़क़ीरी का अलग अपना मज़ा है
सलामी आप ही दो साहबी को

बुरे हालात ‘माही’ मुल्क़ के हैं
भटकती है जवानी नौकरी को

माही

1 Comment · 30 Views
Copy link to share
Mahesh Kumar Kuldeep
15 Posts · 887 Views
Follow 1 Follower
प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियाँ एवं सम्मान – अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी गज़ल, कवितायें आदि का प्रकाशन... View full profile
You may also like: