भीनी प्रेम फुहार

ले-लेकर घन दौड़ती, यहाँ-वहाँ दिन रात |
वही हवा बरसात की, लाती शुभ सौगात ||

आये वारिद झूम के, भिन्न-भिन्न आकार |
ढांक रहे हैं व्योम को , अपने पंख पसार ||

ओ मतवाले मेघ सुन, मतकर सोच विचार |
शुष्क ह्रदय पर डाल दे , भीनी प्रेम फुहार ||

रूठे घन बरसा सुधा , जी जाएं सब खेत |
वसुधा का आँचल खिले, सिमटे बालू रेत ||

चाहे मत बरसों यहाँ, मगर न जाना भूल |
मुरझाएंगे मेघ सब , नीर बिना यह फूल ||

विरहन को तरसा रहा, तपा रहा क्यों देह |
ओ अलबेले मेघ जा,…और कहीं दे मेह ||

फिर बादल नजदीक है, फिर जागा है चाव |
बना रहा है लो पुनः, मन कागज़ की नाव ||

~ अशोक कुमार रक्ताले.

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