भिखारी

एक भिखारी जोड़ से, लगा रहा है टेर|
बना निकम्मा आलसी, या किस्मत का फेर||

गली-गली में घूमता,फैलाता है हाथ|
दर-दर ठोकर खा रहा, दो बच्चे भी साथ||

फटी-पुरानी झोलियाँ, काँधे ऊपर टाँग|
आते-जाते लोग से, भीख रहा है माँग||

सर्दी-गर्मी धूप में, चलता नंगे पाँव|
चैन कभी पाता नहीं, मिले न सुख की छाँव||

हाथ पेट पर फेरता,लगी हुई है भूख|
हड्डी पसली एक है, होठ गए हैं सूख||

दीन-हीन उसकी दशा,है बेबस लाचार
पाँवों में छाले पड़े,दिखता है बीमार||

हाथों में डंडा लिए,चलता धीमी चाल|
फेके टुकड़े पर नजर,किया भूख बेहाल||

बेबस आँखों में नमी,मुख से निकले आह|
मुट्ठी भर दाना मिले, बस इतनी-सी चाह||

कभी जोड़ता हाथ वह, कभी पकड़ता पैर|
लब पर है लाखों दुआ,माँगे सबकी खैर||

है केवल ढाँचा बचा, चिथड़े पड़े शरीर|
हाय विधाता ने दिया,क्यों फूटी तकदीर ||

-लक्ष्मी सिंह

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