** 'हिंदी की आत्म कथा' **

*उठ कर गिरी हूँ,
गिरकर उठी हूँ,
यही संघर्ष मेरा,
अभी भी निरत है।

*अस्तित्व कायम रखकर,
कटाक्ष सबके सहकर,
सर्वस्व कायम रखकर,
श्लाघनीय बनी हूँ।

*हाँ,हूँ मैं वही,
राजभाषा तुम्हारी,
राष्ट्रभाषा कहलाती,
क्षितिज से मिली हूँ।

*तुम्हे व्यक्त करती,
तुम्हें भाव देती,
कलुष तम को हटाती,
चली आ रही हूँ।

*क्षितिज छोड़ प्राची सम,
अरुण हो चली हूँ,
शून्य तक पहुँच,
उच्च शिखर तक बढ़ी हूँ।

*अनेक भाषाओं की जननी,
मैं अकेली खड़ी हूँ,
सहोदरी भाषा कहलाती,
सब पर भारी पड़ी हूँ।

*हिंदी से हिंग्लिश
बनाया गया है।
अस्तित्व एेसे मेरा
मिटाया गया है।

*फिर भी दिखती हूँ,
इंग्लिश के आगे अभी भी,
अस्तित्व अपना कायम,
बनाया हुआ है।

*एक ही दिन मुझको,
यह सम्मान दिलाते हो,
क्यों हिंदी दिवस,
रोज नहीं तुम मनाते हो।

*विश्व हिंदी दिवस से,
क्या तुम हो दर्शाते,
वो आदर-सत्कार,
क्या मुझको दिलाते।

*सम्मान यह मेरा,
तभी ही बढे़गा,
सर्वमान्य बनाओगे,
तभी हिंद चलेगा।

*एक ही दिन सम्मान से ,
न हासिल कुछ होगा,
सर्वमान्य बनाना है,
तो संघर्षरत रहना होगा।

*प्रण कर लो अभी से,
सुधार तभी यह होगा,
कार्यस्थलों पर साक्षात्कार,
हिंदी में ही गर होगा।

*सफल संघर्ष मेरा,
तभी ही बनेगा,
जन-जन का अगर,
साथ मुझको मिलेगा।

*अग्निपथ पर खड़ी हूँ,
ज्वाला-सी बनी हूँ,
साथ सबको लिए,
सहोदरी में बनी हूँ।
सहोदरी में बनी हूँ।

*हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

*हिंदी है जन-जन की भाषा
हिंदी मेरे हिंद की भाषा
हिंदी का सम्मान करो तुम
हिंदी पर अभिमान करो तुम ।।।
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