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** भाव भाषा का **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

February 4, 2017

भाव भाषा का समझते हैं हम तभी
जब माँ की तरह प्यारी हो मातृभाषा
मात प्यारी है तात् जिस तरह हमारी
प्यारी हो मातृभाषा भी हमें हमारी
निज भाषा का गौरव होना चाहिए
वरना यह संसार रौरव से कम नहीं
हिंदी में बिंदी का उतना ही महत्त्व है
जितना नारी के माथे की बिंदी का है
बन्धन तोड़े टूटे नहीं राखी का कभी
ऐसा बन्धन हो हिन्द- हिंदी का कभी
मात्र मातृभाषा दिवस मनाना ही नहीं
आचरण में उतारना भी जरूरी है
पता नहीं क्या हमारी मजबूरी है
मातृभाषा राजभाषा में क्यों दूरी है
तुलस ने जिसे बनाया आम भाषा
बन न पायी आज राज-काज भाषा
सोचो आज विचारणीय प्रश्न है ये
रोज आते और जाते रहे हैं दिवस ये ।।
?मधुप बैरागी

Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि... Read more
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