भाव की शुचि धार है माँ!

प्रेम की साक्षात प्रतिमा,वेद की भाषा धरा पर,
भाव की शुचि धार है माँ!

नेह की शुचि धार देकर,सींचती हैं माँ तनय को,
हर्ष पूर्वक झेल लेतीं ,राह के सारे अनय को,
प्रेम का दरिया बहाकर,शांति लाती है धरा पर-
सच !मनुज यह मान लो तुम,सृष्टि की उपहार है माँ!

ढूँढते क्यों हो विजन में,पूजते क्यों हो शिला को,
ईश है जब गेह में ही,ढूँढना फिर क्यों इला को,
बाँह गह लो मात का नर,पूर्ण कर लो साधना री!-
मात पग की धूल ले लो,इस धरा की सार है माँ!

याद कर लो दिव्य क्षण को,गोद में लेकर सुलाना,
हाथ कोमल को पकड़कर ,चाँद को फिर-फिर बुलाना,
स्वंय सो जाती धरा पर,और शिशु को दे बिछौना-
सद्य इतना जान लो नर,प्रेम की अवतार है माँ!

उर न उनका तुम दुखाना,भार सेवा का उठाना,
दूध का जो कर्ज़ माथे,लाज भी उसकी बचाना,
स्वर्ग का सुख सार यहीं तो,शुभ चरण में दिव्य गंगा-
मौज की दरिया तरंगित,मोक्ष का शुचि द्वार है माँ!

प्रेम की साषात प्रतिमा,वेद की भाषा धरा पर,
भाव की शुचि धार है माँ!

सरस्वती कुमारी, ईटानगर।

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