Jun 17, 2017 · कविता

भारत मां का लाल दुलारा

आज सूर्य एक अस्त हुआ है l
दूसरा कल उदित होगा ,
मन दुखों में है अभी,
फिर से यह मन प्रमुदित होगा l

धीर था वह वीर था l
रणभूमि का रणधीर था ,
किंचित भयभीत था नहीं वह ,
लड़ कर मरा शूरवीर था l

आएगा वह फिर धरा पर l
कर्तव्य निज निभाने को ,
आज मार गया जो शत्रु ,
कल उसे सताने को l

भारत मां का लाल दुलारा l
माता पिता का था वह प्यारा ,
भीगी पलकों से उसे अब,
याद करे यह देश सारा l

चूड़ी टूटी बिंदी छूटी रो रही लुगाई है l
उजाड़ गया श्रृंगार उसका , शत्रु बड़ा कसाई है ,
पुत्र -पुत्री बहन ,भाई बेकल हो रो रहे सभी,
समझ में नही आ रहा , कैसी विपदा छाई है l

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