भारत माँ की पुकार

जब दहक उठा सीमांत,
पुकारा मां ने शीष चढ़ाने को ।
नौ जवां लहू तब तड़प उठा ,
हँसंते हँसते बलि जाने को ।।

गरजे थे लाखों कंठ ,
आज दुश्मन को मजा चखाएंगे।
भारत धरणी के वीरों का ,
जौहर जग को दिखलाएंगे।।

कायरों सुनो छिपने वालों ,
पीछे से क्या आघात किया।
कुछ मासूमों के प्राण खींच,
अपनी नीयत का भाष दिया।।

बैरियों आज सुन लो मेरी,
मां का सपूत अब जग उठा ।
सोती सिंही के बेटों को,
ललकारा तूने बुरा किया।।

रण में क्षण-क्षण कण-कण बनकर,
बिखरेगी अब सेना तेरी।
पापियों दम्भ से भरे घटों,
छू लिया अगर माँ को मेरी।।

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