Jan 8, 2018 · कविता
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भारत माँ का बंटवारा

माजी तेरी किश्ती के तलबगार बहुत है ,,,,
इस और कुछ मगर उस और बहुत है ।

जिस शहर में खोली है शीशे की तूने दुकान ,,उस शहर में पत्थर के खरीदार बहुत है ।।

तू तू और में में करने के नापने के लिए बंटवारे के खेत को जमींदार बहुत है ।

वो चीन भारत माँ को आँखे दिखा रहा ,,
उसकी आँखे फोड़ने के लिए
हमारे जवान सेनिको की ज़िमेदारी बहुत है ।।

दुश्मन देश में गढ़ा काला धन को श्वेत करने की जवाबदारी भी जिम्मदारो भी बहुत है
प्रवीण शर्मा ताल
जिला रतलाम

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