कविता · Reading time: 2 minutes

सुनो सिंहासन के रखवाले !

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपुरा में आतंकी हमले में हुतात्मा वीरों के याद में शासनतंत्र को कर्तव्यबोध दिलाती एक कवि की भावपूर्ण कविता –

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कविता
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कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर,

हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर !

क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन नैया धीरों की डूब गयी,

विस्फोटों को सहते-सहते , जनमानस उद्वेलित अब उब गयी ।

ले उफान गंगा की व्याकुल धारा , छोड़ किनारा उछल रही ;

नर्मदा दुख से आहत हो , युद्ध हेतु दृढ़ सबल दे रही ।

जिहादों से घूट-घुट , हर दिन वीर मरे जाते हैं,

विस्फोटों के धुएं में हर धीर कटे जाते हैं ।

आज वीर मरे जो हैं , धैर्य देश का डोला है ,

शासन की कर्तव्य बोध को जनमानस ने तोला है ।

बिलख रही कुमकुम रोली, बिलख रही नूपुर की झंकार,

बिलख रही हाथों की चूड़ियाँ , हाय ! बिलख रही मृदु कंठ-हार ,

बिलख रही धरा झंझावातों से, बिलख रही नयन नीर-धार ;

बिलख रही कैसी सौम्य सुरम्य प्रकृति , बिलख रही अखंड सौम्य श्रृंगार !

कारगिल की शौर्य पताका , नभोमंडल में डोल रही,

हे भारत के कर्णधार युद्ध कर अब बोल रही !

डोली शौर्य पताका वीर शिवा की, हल्दीघाटी भी डोली है ,

बिस्मिल की गजलें भी डोली , डोली वीर आजाद की गोली है ।

वीरों की माटी की धरती , अपने गद्दारों से डोल रही ;

अकर्मण्य , अदूरदर्शी , सत्तालोलुपों से , कड़क भाषा अब बोल रही !

हे सिंहासन के रखवाले , करो याद कर्तव्य करो विचार ,

सिसक रहा है सारा देश , सर्वत्र मची है करूण पुकार ,

धरणी सीमाओं पर तांडव करती , कैसी मानव की पशुता साकार ;

क्या व्यर्थ जाएगा यह बलिदान या कर पाओगे अमोघ प्रतिकार !

माथे का कलंक भयावह , जगे शौर्य कंटक दंश मिटे ;

शत्रु को धूल-धूसरित कर , फिदायीन जालों के पंख कटे ।

आतंक मिटाने में बाधक , किसी का मत तथ्य सुनो तुम ;

जिहादियों को राख कर दे , स्वाभिमानी उपक्रम चुनो तुम !

महा समर की बेला है , ले पाञ्चजन्य उद्घोष करो ;

शत्रु को मर्दन करने को , त्वरित आर्ष भाव में रोष भरो ।

सेना को आदेश थमा दो , भयावह विप्लव ध्वंस मचाने को ;

अपने गद्दारों सहित समूचे आतंकिस्तान विध्वंस कराने को ।
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अखंड भारत अमर रहे !
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✍🏻 कवि आलोक पाण्डेय

वाराणसी ,भारतभूमि

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