Mar 30, 2017 · कविता
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भारतीर रेल पर व्रतांत

अपना जीवन छुक-छुक करती एक भारतीय रेल सा भैया,

कहां हो जाये दुर्घटना और कहां
उतर जायेगा पहिंया,

नई दिल्ली से चलने वाली क्या चेन्नई तक पहुंचायेगी,

क्या स्लीपर टूट जायेगा या पटरी उखड़ जायेगी ,

बचपन से लेकर बुढ़ापे तक जाने कितने स्टेशन आते ,

मंज़िल पाने के चक्कर में सब कुछ अपना गंवा जाते ,

कब होंगे काम अधूरे क्या पूरा
हो पायेगा सपना ,

इन्दौर से चलने वाली कहां पहुंच पायी थी पटना ,

जीवन की भागा दौडी में कब तक नांचे ता था थैया,

अपना जीवन छुक छुक करती
ऐक भारतीय रेल सा भैया,

कहां हो जाये दुर्घटना और कहां
उतर जायेगा पहियां,

? रचनाकार प्रमोद रघुवंशी?
दिनांक -26-11-2016

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Pramod Raghuwanshi
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