भारतीय जवान की अभिलाषा

सीमा पर मुस्तैद खड़ा हूं, हर मौसम दुरह स्थानों में
तपती रेत और बवंडर, रेतीले मैदानों में
दुर्गम चोटियों पर रहता हूं, बर्फीले तूफानों में
तेज हवा पानी और जंगल, जल थल आसमानों में
दुश्मन की गोली खाता, जीता आतंक के साए में
जान हथेली पर रखता, मातृभूमि की रक्षा में
मैं हूं देश का अमर जवान, डटा हुआ सीमाओं में
देशवासियों एक रहो, मत बंटो व्यर्थ की बातों में
धर्म जाति वर्गभेद, भाषा अंचल अन्य विवादों में
सबसे पहले देश हमारा, थाम तिरंगा हाथों में
अंतिम इच्छा देशवासियों, तुमको आज बताता हूं
तन मन धन अर्पण है मेरा, थाम तिरंगा गाता हूं
रक्षा करना मातृभूमि की, भेदभाव ना लाना
गर शहीद हो जाऊं मैं, पावन माटी का तिलक लगाना
जयहिंद
सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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