भावनाप्रधान देश भारत

आधुनिक भारत एक कृषिप्रधान देश नहीं बल्कि एक भावनाप्रधान देश हैं, हम प्राच्य सूक्ति “प्राण जाए पर वचन न जाए” पर ना जीकर अब “प्राण जाए पर भावना न जाए” पर जीते है । “विश्व-गुरु रहे थे पुरखे” गान-गाने और उसकी भावना बचाने में लगे हैं, हमें कोई नई उपलब्धि या ख्याति नही चाहिए ,अभी हम फ़क्र को पका रहें हैं।

हमारे आविष्कार,अनुसन्धान और खोजें सभी भावनाएं ही है।भावनायें बचाते-बचाते हमारी जिन्दगी गुजरी जा रही है,सदियों से हम भावनाएं ही बचा रहे है|

सोने की चिड़िया कब चिड़ियाघर में मर गई पता नहीं, पर हम चिड़ियाघर के मालिक है ,यह सुखद भावना मुख पर तेज प्रकट करता है।

दूसरा पक्ष तो और मार्मिक है ,हमारी भावनाएं कोई भी आहत कर देता है,एक क़िताब ,एक गाना, एक रंग या एक चुटकला। इनकी पैठ संवेगों से भी है,एक आदेश पर नक्सा बदलने का आस्वासन प्राप्त हैं।

हम संभावना में भावना खोजते है और मर्यादा त्याग कर भावनाओं पर गर्दभ-शिरोमणि जैसे गर्व करते है ।
आहत और भावना में दोस्ती हैं या दुश्मनी, पता नहीं पर कुछ हैं जो जायज नहीं हैं।

अब आप ही तय कर ले कि भावनाओ में बह जाना है या विवेक का बांध बना भावनाओ को सवारना है। क्योकि कहा भी गया है-

“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”।

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