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भरोसा – कहानी

भरोसा – कहानी

विकास गुप्ता एक कपड़े के व्यापारी हैं बाज़ार में इनकी एक कपड़े की बड़ी सी दुकान है | परिवार खुशहाल और समृद्ध है | माता – पिता के साथ – साथ , पत्नी प्रिया और दो बच्चे अंशुल और अनुज्ञा हैं | विकास की एक बहन भी है रश्मि | अंशुल कक्षा दसवीं और अनुज्ञा कक्षा आठवीं में पढ़ती है | दोनों ही बच्चे पढ़ाई में काफी होनहार हैं |
सब कुछ बहुत ही ठीक तरीके से चल रहा है | विकास के घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है | विकास के एक पड़ोसी हैं अंसारी जी | जो कि एक इंजीनियर हैं और शहर के ही पी. डब्लू. डी. विभाग में कार्यरत हैं | काफ़ी ईमानदार और सीनियर भी | इनकी मासिक आय है इनकी जरूरतों से काफ़ी ज्यादा | घर पूर्ण रूप से सम्पन्न है फिर भी अंसारी जी सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखते हैं | अंसारी जी का एक बेटा है असलम जो कि खुद एक अधिकारी के पद पर सरकारी विभाग में कार्यरत है | इनकी एक बेटी भी थी नुसरत जो कि बचपन में ही निमोनिया बिगड़ने की वजह से अल्लाह को प्यारी हो गयी थी | अंसारी जी की बेग़म को एक बेटी की बहुत ख्वाहिश थी | पूरी कॉलोनी के लोग अंसारी जी के व्यवहार और सादगी से प्रभावित थे |
बात मार्च 2020 के आसपास की है जब कोरोना भारत में दस्तक दे चुका था और लॉकडाउन की घोषणा कर दी गयी थी | विकास को भी अपनी दुकान के शटर बंद करने पड़े | यह सिलसिला काफ़ी लंबा चला | इस बीच विकास के माता – पिता दोनों को कोरोना ने अपने चपेट में ले लिया | विकास के परिवार ने उनके ईलाज का पूरा – पूरा इंतजाम किया | प्राइवेट अस्पताल में उनका ईलाज़ चला करीब 30 दिन तक वे अस्पताल में रहे और अंततः ठीक होकर लौटे | किन्तु जिस दिन उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया उनके हाथ में करीब तीस लाख का बिल थमा दिया गया | विकास ने अपनी बहन की शादी के लिए रखे रुपये , उसकी अपनी और पत्नी की सेविंग्स मिलाकर किसी तरह से 30 लाख का भुगतान हुआ | अंसारी जी ने शारीरिक और मानसिक तौर पर विकास के परिवार की बहुत मदद की साथ ही उन्हें आर्थिक मदद की भी पेशकश की किन्तु विकास ने मना कर दिया |
माता – पिता के ईलाज ने विकास को आर्थिक तंगी के द्वार पर ला खड़ा किया | अब विकास ने अपनी बहन के विवाह के बारे में भी सोचना बंद कर दिया | अप्रैल का महीना आ गया | बच्चों के पढ़ाई के नए सत्र का आगमन | एडमिशन फीस, कॉपी – किताबों का खर्च साथ ही ऑनलाइन पढ़ाई के लिए बच्चों को मोबाइल की सुविधा | ये सब विकास और उसकी पत्नी की परेशानी और बढ़ा रहे थे | लॉकडाउन बढ़ते ही जा रहा था | विकास की आय का कोई जरिया नहीं था फिर भी विकास ने किसी से मदद नहीं मांगी | बीच – बीच में अंसारी जी उनका हालचाल पूछ जाते और मदद के लिए कह जाते थे किन्तु विकास संकोचवश उनसे कुछ नहीं कह पा रहा था |
दो दिन बाद की बात है विकास के घर पर एक पार्सल आया | उसमे दो मोबाइल थे | विकास की पत्नी ने डिलीवरी बॉय से पूछा – किसने भेजे हैं ? इस पर डिलीवरी बॉय ने नाम बताने से मना किया और कहा कि भेजेने वाले ने अपना नाम और एड्रेस नहीं लिखा है | विकास की पत्नी को थोड़ा आश्चर्य हुआ फिर भी उसने डिलीवरी ले ली यह सोचकर कि किसी ने उन्हें सरप्राइज देने के लिए ऐसा किया होगा | उसे खोला तो एक पत्र भी मिला | जिस पर लिखा था अंशुल और अनुज्ञा आप अपनी पढ़ाई जारी रखें और हर वर्ष की तरह ही अपने मम्मी – पापा , दादा – दादी का नाम रोशन करना | नीचे लिखा था – आप सबका शुभचिंतक | विकास की पत्नी ने यह बात विकास को बतायी | उसे भी बड़ा अचरज हुआ कि इस पीड़ा की घड़ी में कौन देवदूत उनकी जिन्दगी में रंग भरने आ गया | इस घटना के चार दिन बाद फिर एक पार्सल आया इस पार्सल में अनुराग और अनुज्ञा के लिए कॉपी – किताबें और बहुत सारा स्टेशनरी का सामान था | विकास और उसकी पत्नी , दादा – दादी , अंशुल और अनुज्ञा खुश तो थे पर उन्हें एक ही बात बार – बार परेशान कर रही थी कि आखिर कौन है ये शख्स जो उनकी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद कर रहा था |
मोबाइल और किताबों की व्यवस्था तो हो गयी किन्तु बच्चों की फीस का क्या करें और कैसे ? विकास और उसकी पत्नी यह सब सोच परेशान थे कि अगले ही दिन अचानक स्कूल से फ़ोन आया कि अंशुल और अनुज्ञा की साल भर की फीस जमा हो गयी है और बच्चों अंशुल और अनुज्ञा को ऑनलाइन क्लास के ग्रुप में जोड़ दिया गया है | पूछने पर पता चला कि कोई शुभचिंतक है जिसने अंशुल और अनुज्ञा की पूरी पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाने का जिम्मा लिया है किन्तु नाम बताने से मना किया है | विकास का पूरा परिवार इस बात से स्तब्ध था | खैर बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई होने लगी | घर के राशन – पानी का इंतज़ाम विकास ने पड़ोस की ही दुकान से उधार पर कर लिया | सब कुछ ठीक चल रहा था | सभी खुश थे | दादा- दादी भी पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके थे |
अभी पंद्रह दिन ही बीते थे कि अचानक एक परिवार के चार – पांच सदस्य विकास के घर आते हैं | विकास उन्हें देखकर थोड़ा संकोच में पड़ जाता है और पूछ बैठता है कि आपका किस कार्य हेतु आगमन हुआ है तो वे बताते हैं कि हम अपने पुत्र प्रियांश का विवाह आपकी बहन रश्मि के साथ करना चाहते हैं यदि आपको कोई एतराज न हो तो | किन्तु विकास ने अपनी आर्थिक असमर्थता जताई और कहा कि वह अभी विवाह का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है | तब लड़के के परिवार वालों ने कहा कि हमें आपकी स्थिति की पूरी जानकारी है हम रश्मि को केवल दो कपड़ों में अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं और शादी का पूरा खर्च हम उठाएंगे |
शादी का मुहूर्त निकला | 20 लोगों को शादी में शामिल होने की इजाजत मिली | विकास का पूरा परिवार , प्रियांश का परिवार और शादी में शामिल हुआ अंसारी जी का परिवार | अंसारी जी को वहां सपरिवार देख विकास के दिमाग में कुछ खटका हुआ | वह सोचने लगा कि उसने तो अंसारी जी को आमंत्रित नहीं किया फिर वे शादी में कैसे शामिल हुए | दूसरी ओर अंसारी जी विकास और उसके परिवार को वहां देख विकास से बोले ‘ बेटे विकास आपने तो हमें बताया ही नहीं कि बेटी रश्मि की शादी हो रही है | विकास कुछ जवाब न दे पाया और शर्मिंदा महसूस करने लगा | खैर शादी सम्पन्न हो गयी | विकास का परिवार बहुत खुश था |
अगले दिन सुबह विकास अपने पड़ोसी श्री अंसारी जी के घर जा पहुंचा और उनके सीने से जा लगा और फफक – फफककर रोने लगा | ये देख अंसारी जी ने पूछा कि विकास क्या बात है बेटा ? क्या हुआ ? सब ठीक तो है ! विकास ने स्वयं को संयमित कर अंसारी जी को उनके द्वारा किये गए अप्रत्यक्ष सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और उनके इस अप्रत्यक्ष सहानुभूतिपूर्ण कार्य की सराहना की | पर अंसारी जी ने कहा कि मैंने तो कुछ भी नहीं किया फिर आप मुझे क्यों शुक्रिया कह रहे हैं | इस पर विकास ने कहा कि जब मैंने आपको शादी में शामिल हुए देखा तभी मेरा माथा ठनका था | फिर शादी के दौरान ही एक ओर खड़े होकर जब आप प्रियांश के पिता का शुक्रिया अदा कर रहे थे तब मैंने आपकी और उनकी सारी बातें सुन ली थी | तब मुझे एहसास हुआ कि ये रिश्ता भी आपने ही कराया है | अंशुल और अनुज्ञा की पढ़ाई का सारा प्रबंध भी आपने ही किया है |
अंसारी जी ने विकास को संयमित किया और कहा कि जिन्दगी में जब भी कोई शुभ कार्य करो तो ऐसे कि दूसरे हाथ को भी पता न चले | बच्चों से मुझे बहुत लगाव है सो मैंने अंशुल और अनुज्ञा की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया जिसमें मेरी बेगम नुसरत ने पूरा – पूरा सहयोग दिया और रही रश्मि की शादी की बात तो उसका पूरा – पूरा श्रेय हमारी बेगम जी को जाता है जिन्हें एक बेटी के न होने का बहुत दुःख था जो उन्होंने रश्मि की शादी कराके पूरा कर लिया | चूंकि दो वर्ष की आयु में हम अपनी बच्ची को खो चुके थे और हमारी बेगम को बेटी की बहुत चाहत थी सो उन्होनें अपनी तमन्ना रश्मि के माध्यम से पूरी कर ली | हमने आप पर कोई एहसान नहीं किया बल्क़ि हमने तो अपने अरमानों को पूरा किया | एक बात और विकास जी आपके बच्चे बहुत ही होनहार हैं उनकी पढ़ाई का खर्चा तो दुनिया का कोई भी इंसान उठा सकता है | आप अपने दिल पर बोझ न रखें | एक पड़ोसी ही दूसरे पड़ोसी का सच्चा मित्र होता है | हम पड़ोसियों को एक दूसरे पर “ भरोसा ” बनाए रखना चाहिए |
विकास अपने और अपने परिवार की ओर से श्री अंसारी जी का शुक्रिया अदा करता है और साथ ही उस खुदा से दुआ करता है कि ऐसे पड़ोसी सभी को मिलें |

Competition entry: साहित्यपीडिया कहानी प्रतियोगिता
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