कविता · Reading time: 5 minutes

भगवान श्री कृष्ण के जीवन की करुण गाथा।

विष्णु अवतार होकर भी ,
कान्हा ने जीवन में सुख न पाया।
जन्म लिया कारा गृह में,
और बचपन गांव में बिताया।

बड़ी कठिनता से वासुदेव जी ने ,
शिशु को कारा गृह से गोकुल पहुंचाया।
और यशोदा जी की कन्या लेकर ,
शिशु को उनके बगल में सुलाया।

दुष्ट कंस को पता लगा तो ,
कन्या की हत्या का प्रयत्न किया ।
मगर उस कन्या ने माया का रूप लेकर ,
कंस को फिर सावधान किया ।

कंस अहंकारी सावधान क्या होता,
वो तो कान्हा की खोज में लग गया।
कान्हा के खोज में असंख्य शिशुओं ,
का अकार्थ ही वध करने लग गया।

अपनी मौत से बचने हेतु वो पापी ,
जाने कितनी ही नन्ही जाने ले गया।
जब पता लगा कान्हा का तो ,
कान्हा के जीवन के पीछे लग गया।

कई तरह के भयंकर राक्षस और राक्षसियां भेजी,
एक नन्हे से बालक को मारने हेतु ।
सगा मामा होकर निर्लज्ज शत्रु बन बैठा,
अपने ही प्रिय बहन के पुत्र हेतु ।

शैशव काल से किशोर अवस्था तक ,
बेचारे कंस के भेजे यमदूतों से जूझते रहे।
मैया यशोदा और नंद बाबा भी,
अपने प्यारे पुत्र पर नित्य प्रति संकट से चिंतित रहे।

खैर वो तो दिव्य बालक थे ,
अपने शत्रुयो को परास्त करते रहे ।
मगर प्रेम के विषय में भी ,
वो संघर्ष सदा करते रहे।

शैशव अवस्था से ही जिस घर में ,
भरपूर प्यार और संरक्षण मिला।
माता यशोदा और नंद बाबा का दुलार ,
गोपियों को प्यार मिला।

वो घर, वो पालक और गांव ,
उन्हें कर्तव्य निर्वाह हेतु छोड़ना पड़ा।
अपनी प्रिय प्रेयसी राधा का भी ,
दिल उन्हें तोड़ना पड़ा ।

अपने पालक ,गोप गोपियां और
राधा से विछोह की उन्हें कहां चाह थी ।
मगर वो जन्में थे किसी महान उद्देश्य हेतु ,
उस उद्देश्य को पूरा करने की विवशता थी ।

सबके प्रेम और दुलार को ,
मन में बसाकर भारी मन से।
वो गोकुल छोड़ मथुरा में आ तो गए,
मगर बड़े व्याकुल मन से ।

एहसास था दिल में ,और सच भी था,
ऐसा प्रेम जीवन में दुबारा कहां मिलेगा।
वो शरारत ,वो हंसी ठिठोली ,वो रूठना मनाना ,
यह सुहाना समय फिर न आएगा।

मथुरा को कंस मुक्त कर ,
अपने नाना और माता पिता को मुक्त किया।
सह रहे थे जो कब से उस दुराचारी का जुल्म,
उस जुल्म से उन्हें सदा किए मुक्त किया ।

अब इसके बाद भी उनके,
शत्रुयों का अंत कहा हुआ ।
कंस के दुष्ट मित्र थे जितने,
उनके साथ भी सामना हुआ ।

शत्रुओं का सदा उनके जीवन में ,
आना जाना लगा ही रहा।
मगर सब पर जीत हासिल करने को ,
उनके बलदायू का सदा साथ रहा ।

प्रेम ने एक बार फिर ली अंगड़ाई ,
लक्ष्मी स्वरूप रुक्मणि से ब्याह हुआ ।
उसके पश्चात दो और रानियो के संग ,
ब्याह उनका हुआ ।

मगर अपनी राधा को फिर भी ,
वो न भूले थे।
उनके अमर प्रेम को ,
सभी नमन करते थे।

फिर प्रारंभ हुआ कौरव पांडवों के मध्य ,
वैमनस्य और फिर अधर्म का खेल ।
कोरवों के षड्यंत्र का सामना करने का ,
पांडवों में नहीं था बल ।

बड़े शूर वीर ,साहसी ,पराक्रमी और
संस्कारी थे पांचों भाई ।
देवी कुंती ने उन्हें श्रेष्ठ मनुष्य बनाने को ,
माता पिता दोनो की भूमिका थी निभाई ।

मगर किसी के षड्यंत्र का सामना
करना वो नही जानते थे।
अपने ही भाई कर सकते है उनके साथ अन्याय ,
और क्रूरता पूर्ण व्यवहार ,नही जानते थे।

कहने को तो कौरव वंश में कुछ लोग ,
उनके पक्ष में थे ।
मगर खुल के साथ नहीं दे सकते थे,
उनके हाथ पैर फर्ज की बेड़ियों ने जकड़े थे ।

ऐसे में उनको उनका हक और न्याय दिलवाने ,
कृष्ण भगवान उनके साथ आए ।
जब ना माने दुष्ट ,पापी ,अहंकारी ,
तो महायुद्ध को ललकार आए ।

इसमें उनका कोई खास प्रयोजन न था ,
उन्होंने तो इस युद्ध में शस्त्र भी ना उठाया।
मगर हां ! अर्जुन के सारथी बनकर ,
उसे उसके फर्ज पर चलना सिखाया।

इसी संदर्भ में उन्होंने गीता का ज्ञान दिया,
जिसने अर्जुन में आत्म विश्वास जगाया।
अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना का ,
उसने शत्रु रूपी सगे संबंधियों को मार गिराया।

गुनाह था गांधारी और धृतराष्ट्र के पुत्र मोह का ,
और गुनाहगार थे दुष्ट कौरव भी ।
महाभारत का विध्वंसक युद्ध हुआ उनकी वजह से,
और परिणाम भूगता भी ।

मगर वासुदेव श्री कृष्ण का इसमें क्या दोष था?
उन्होंने तो भरसक प्रयत्न किया युद्ध को टालने का।
मगर इन दुष्टों पर काल चढ़कर नाच रहा था,
कहा कहां माना ,ना मान रखा कान्हा की बात का।

दोष था कौरवों का ,पापी थे वो ,
अपने वंश के विनाश के स्वयं उतरदायी थे।
फिर गांधारी ने श्री कृष्ण भगवान को क्यों श्राप दिया,
जबकि वो बेकसूर थे।

मूर्ख स्त्री द्वारा दिए गए श्राप को भी सह गए,
मगर जुबान से बदले में कोई कठोर शब्द न कहे।
वैसे तो जायज था उसकी आंखें खोलना,
मगर उसकी मनस्थिती को भांप कर मौन रहे।

कितनी असहनीय पीड़ा हुए होगी उनको ,
सुनकर अपने वंश के नाश का श्राप सुनकर।
हाय कान्हा! तुमने क्यों प्रतिकार न किया ,
कैसे और क्यों सह गए ,क्यों नहीं कहा कुछ उसको?

तुम सारा जीवन दुख उठाते रहें कोई न कोई ,
ईश्वर होकर भी नहीं किया कोई प्रतिवाद ।
तुमने सदा धैर्य ,करुणा ,स्नेह और प्रेम आदि गुणों,
से परिपूर्ण थे सोलह काला सम्पूर्ण थे ।
तुम चखा सकते थे उस मूर्ख स्त्री को उसकी
घृष्टता का स्वाद ।

महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों को उनको
सत्तासीन कर द्वारका आए।
और यहां आकर कुछ समय में ही गांधारी का
श्राप फलित हुआ।
देखकर अपने नेत्रों के सामने तुम हो गए
मौन और निस्साहय ।

बहाना बना एक कुपुत्र सांब जिसकी वजह से,
सारा विनाश हुआ ।
और अंत में तुम्हारे हाथों स्वयं अपने सगे संबंधियों
का नाश हुआ।

तत्पश्चात तुम अकेले रह गए तो ,
अपने दुख संताप को मिटाने एकांतवास करने लगे।
किसी निर्जन वन में आकर कुछ पल ,
विश्राम तुम करने लगे।

परन्तु वहां विधि ने ऐसा कुचक्र ,
रचा रखा था।
बहेलिए के रूप में काल को ,
खड़ा रखा था।

हटभागे ने चलाया ऐसा विषैला तीर,
जो लेते हुए प्रभु के श्री चरणों में आ लगा ।
कराह सुन प्रभु की दौड़ के आया ,
और उसने क्षमा मांगने लगा।

प्रभु ने पूर्व रामावतार की घटना का ,
स्मरण कर उसे ढांढस बंधाया।
और विधि का लेख को स्वीकार कर,
उसे बहेलिए को क्षमा कर दिया।

तत्पश्चात प्रभु अपने निज धाम पधार गए,
परिवार सारा बिखर गया , रानियां सती हो गई।
प्रभु के चले जाने के बाद द्वारका भी समुद्र में समा गई।

भगवान श्री कृष्ण ने अधर्म का नाश कर ,
धर्म की स्थापना में अपना परिवार को दिया।
पतंतु उनके इस त्याग और सहनशीलता ने,
जन जन के ह्रदय में सदा के लिए स्थान बना लिया ।

जन जन के ह्रदय सम्राट भगवान श्री कृष्ण ,
आकर्षक एवं आदर्श व्यक्तित्व के स्वामी थे ।
भक्त वृंदो के प्राण प्यारे ,यशोदा व् नंद के दुलारे ,
श्री नारायण के सबसे श्रेष्ठ योगेश्वर अवतार थे।
आप को हमारा शत शत प्रणाम ।

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