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भगवान भरोसे!

चलो भाई राम भरोसे,
राम भरोसे,राम भरोसे,
कभी सुना था ये गाना,
इतने वर्षों बाद याद दिलाया,
निर्मला सीतारमण ने यह तराना।

अर्थ व्यवस्था जो बेजार है,
भगवान इसका जिम्मेदार है,
उसने ही यह हालात बनाए,
हम इसमें क्या कर पाएं ।

अर्थशास्त्री सोलह से बता रहे थे,
किन्तु यह तब मान कहां रहे थे,
तब दोषी ठहराने को कोरोना नहीं था,
तो दोषी बतलाने को ओला उबर था।

हालात इतने खराब हो गये हैं,
यह इसे कहां बता रहे हैं,
यह स्वीकारोक्ति भी रिजर्व बैंक से आई,
जिसने अब यह बात बताई।

मंत्री महोदया ने तो भगवान पर ठिकरा फोड़ दिया,
राज्यों को जी एस टी का हिस्सा देना छोड़ दिया,
एक देश एक राष्ट्र का,कर वसूलना काम नहीं आया,
राज्यों को ऋण लेकर जाने को कहा।

यही हाल अपने रक्षामंत्री जी का भी है,
कहने को कहते हुए कुछ बनता नहीं है,
चीन ने सीमाओं का अतिक्रमण किया है,
सैनिकों ने भी अपना बलिदान दिया है,
लेकिन मुखिया जी ने यह बोल रखा है,
किसी ने भी अपनी सीमाओं का उलंघन नहीं किया है,
अब रक्षामंत्री जी कैसे यह कह पाएंगे,
चीनियों ने हमारी भूमि पर कब्जा किया है,
इस लिए वह खामोश रह कर समय बिता रहे हैं,
अशांत भावनाओं को समेटे शांत नजर आ रहे हैं।

जयशंकर भी कहां आकर फंस गए हैं,
जब तक नौकरशाह थे, तब तक ही ठीक थे,
अब मंत्री बनकर सिकुड़ से गये हैं,
विदेशों से तो चर्चा मुखिया जी ही कर रहे हैं,
इन्हें तो मुखिया जी की डील ही दोहरानी होती है,
अपनी राय जाहिर करने की, जरुरत ही नहीं पड़ी है,
पुछने पर गोल-मटोल कह कर निकल पड़ते हैं,
निर्विकार भाव में ही दिखाई पड़ते हैं।

गृह मंत्री जी के तो कहने ही क्या है,
जब से पदभार संभाला है,
विरोधियों के निशाने पर चल रहे हैं,
काश्मीर पर इतना कुछ किया है,
तीन सौ सत्तर से मुक्त किया,
पूर्ण राज्य को केन्द्र शासित किया,
एक को तोड कर,दो में बांट दिया,
आंतकवाद को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया,
नागरिकता कानून को लेकर आए,
इस पर लोग शोरगुल मंचाए,
दिल्ली को दिल्ली में रह कर भी ना जीत पाए,
नमस्ते ट्रंप भी काम नही आया,
दिल्ली में दंगा और गले पड़ आया,
अब यह भी कसर बाकी रह गई थी,
जो कोरोना की नजर इन पर आ पड़ी थी,
एक नहीं दो-दो बार अटैक किया है,
विरोधियों से इसका कोई पैक्ट हुआ।

नितिन गडकरी एक नाम है,
जो करता दिखता कुछ काम है,
औरौं के कहने करने को कुछ बचा नहीं,
अपने महकमे में कहीं दिखते नहीं,
हां मुखिया की बातों को रट रखा है,
राहुल के कुछ कहने पर झपट रहा है,
जैसे यही काम इनके जिम्मे है,
बाकी के कामों में निकम्मे हैं।

अच्छे दिन तो निशंक जी के आए हैं,
नई शिक्षा नीति यह लाए हैं,
अब प्रतियोगी परीक्षा कराने जा रहे हैं,
नौजवानों, बच्चों में उमंग ला रहे हैं,
घर पर बैठे-बैठे उब गये थे,
इस बहाने से घर से बाहर जा रहे हैं।

जो अच्छा हुआ,वह हमने किया,
जो पहले किया गया वह सब ग़लत था,
इसका दोषी और कोई नहीं,
कांग्रेस में जमा नेहरू परिवार था,
और अब जो गलत हो रहा है,
वह तो भगवान का कोप है,
इसमें हमारा नहीं कोई दोष है।।

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सामाजिक कार्यकर्ता, एवं पूर्व ॻाम प्रधान ग्राम पंचायत भरवाकाटल,सकलाना,जौनपुर,टिहरी गढ़वाल,उत्तराखंड।
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