भगवान परशुराम जयंती पर रचना

जय भगवान परशुराम

पितृ भगत परशुराम जी , विष्णु के छठे अवतार हुए ।
पिता जमदग्नि माँ रेणुका के,पांचवें ऋषिकुमार हुए ।। टेक
१ त्रेतायुग मैं भृगु कुल के , घर मैं होया उजाला
शुक्ल पक्ष की बैशाख तीज नै , जनम्या फरसे आला
मात-पिता नै बड़े चाव से , लाड लडा कै पाला
ऋचीक मुनि और कश्यप जी नै , दिया ज्ञान निराला
सारंग धनुष और अविनाशी मन्त्र , गुरु देण नै तैयार हुए ।।
२ जमदग्नि नै एक समय मैं , हवन करण की धारी थी
गंगाजल गई लेण रेणूका , वा घड़ी बीतती जार्ही थी
क्रोध के कारण जमदग्नि नै , मन मैं गलत विचारी थी 
पिता आज्ञा तैं परशुराम नै , माँ की गरदन तारी थी
वर मैं जीवन मांग्या उनका , हटकै फेर दीदार हुए ।।
३ कपिला गाँ के कारण उसनै , सहन्स्रबाहु मार दिया
सहन्स्रबाहु के बेट्यां नै सिर , जमदग्नि का तार दिया
क्रोध मैं भरकै परशुराम नै , खपा सब परिवार दिया
पांच तला भरे खून तैँ , कर दुश्मन का संहार दिया
इक्कीस बार मिटा दिए छत्री , ऐसे बली अपार हुए ।।
४ गरीबों का था प्यारा वो , नारी का सम्मान कऱ्या
भीष्म , द्रोण और कर्ण जिस्यां नै , गुरु रूप मैं ध्यान कऱ्या
जाति श्रेष्ठ ,ब्राह्मण जाति , वेदों नै व्याख्यान कऱ्या
लाखण माजरे आले नै परशुराम गुणगान कऱ्या
कपीन्द्र शर्मा अपणे गुरु के , शिष्य ताबेदार हुए ।।

लेखक – कपीन्द्र शर्मा
©®kapinder sharma

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