कविता · Reading time: 1 minute

बड़ा होने में

आदमी जितना बड़ा होता है
उतना बड़ा सहता है नुकशान भी
उतनी बड़ी उससे होती हैं गलतियाँ भी
सहता है उतनी बड़ी तल्खियां भी ,

विशाल पेड़ को धराशायी करने को
तत्पर रहती हैं आंधियां
विशाल नदियाँ बाँधी जाती
अनेक किनारों से ,पुलों से ,महानगरों से
विशाल पर्वत ज्वालामुखी से ,हिमपात से
राह बनाने में चीरे जाते उसके सीने .

बड़ा आदमी बड़ी गलतियां भी करता है
उसका खामियाजा भुगतता है
लग जाता है उसमे दाग ,ग्रहण
जिसे ढोता है अक्सर जीवन भर
मगर करता नहीं इसकी परवाह
वह देखता है समुद्र अथाह
छलांग लगाने के लिए
विस्तृत आकाश उड़ान भरने के लिए
जनमानस के अविरल आंसू सोखने के लिए
वह आगे देखता है सदैव
लिखता है अपना भाग्य स्वयं
बनाता है अपने हाथों को भगवान्
निर्जीव को भी प्राणवान .*

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