कविता · Reading time: 1 minute

बौछार।

नीरज चढा नभ मे
श्यामल रंग उभार
सूर्य की कांति छिपी
होने लगा अंधकार ।

बोले मयूर पपिहा बोले
बल खाती पूर्वा डोले
दामिनी की चमक धमक
हुंकार उठे जलद अतोले ।

मस्ताई समीर उङी
ले रिमझिम सी बौछार
तडित तङातङ लगी ताकने
खुले यकायक मेध द्वार ।

महक उठी वशुन्धरा
झुका व्योम साकार
अद्भुत दृश्य प्रेम का
प्रकृति का उपहार ।

ताप से मुक्ति मिली
चलने लगी बयार
सरसरी तन मन उठी
बढा प्रेम व्यवहार ।

देवेन्द्र दहिया- अम्बर
@ copyright

2 Likes · 2 Comments · 92 Views
Like
37 Posts · 2.3k Views
You may also like:
Loading...