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बोलो तुम भी उदास थे क्या

मेरी तरह वफा तुम मेरे ही पास थे क्या|
मुझसे बिछड़के बोलो तुम भी उदास थे क्या|
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यादों में आके मुझसे करते थे गुफ्तगू तुम,
तन्हाइयों के वो पल तुमको भी रास थे क्या|
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बरसात की तपिस में झुलसा बदन तुम्हारा,
सूखे लबों पे काबिज हम ही वो प्यास थे क्या|
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बैचेन थी नजर बस दीदार को तुम्हारे ,
रिश्तों की भीड़ में हम तुमको भी खास थे क्या|
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भूले न हों कहीं वो आतीं न हिचकियां हैं,
ऐसे तुम्हारे दिल में उठते कयास थे क्या|
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आवाज से यकायक आते थे होश में हम,
हाथों तुम्हारे अक्सर टूटे गिलास थे क्या|
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रिमझिम हुईं ‘मनुज’ उन अश्कों की बारिसों में,
मेरी तरह तुम्हारे भींगे लिबास. थे क्या|

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मनोज राठौर मनुज
मनोज राठौर मनुज
आगरा
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प्रकाशित कृतियां-- गजल शतक (100 गजलों का संग्रह), सिलवटें (गजल गीत संग्रह), कई साझा संकलन,...