कविता · Reading time: 2 minutes

बोलते क्यूँ नहीं

चुप क्यूँ हो ?
बोलते क्यूँ नहीं ?
चीखते क्यूँ नहीं ?
तुम तो मेरे अपने हो
मुझे पहचानते क्यूँ नहीं ?
मै हूँ ,हाँ मैं ही तो हूँ…
तुम्हारी बेटी, बहिन, माँ
और न जाने क्या -क्या
मै बहुत दर्द में हूँ, भितर तक
अंदर बहुत अंदर, तहखाने तक।
जीभ कट गए हैं मेरे
दर्द शब्द अब बनते ही नही
चीख है जो कंठ से निकलते ही नही
तुम तो मेरे अपने हो न। ?
चीखो न तुम मेरी जीभ बन कर,
रोज-रोज नोची जा रही हूँ मैं
कभी रेबाड़ी तो कभी दिल्ली
अब उन्नाव फिर झारखंड
जाने कहाँ-कहाँ न लूटी गई
हर दिन हर पल नोची जा रही हूँ
फाड़ी जा रही हूँ धरती की तरह
तुम तो कहते थे …
बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ
क्या हुआ ? बचाते क्यूँ नहीं ?
सब कुछ तो है तुम्हारे ही पास
तुम तो राजा हुए हो,
तुम तो भगबान हुए हो
तुम तो दिखने वाले, छूने वाले
भगबान हो हुए हो,
फिर करते क्यूँ नहीं कुछ…?
करो न कुछ, मेरे लिए मेरी बहनों के लिए
या बोल दो कुछ कर ही नहीं सकते
या तुम करना ही नही चाहते, हमारे लिए
माँ मेरी देख रही है…मेरे दर्द को
पर चुप है वो भी पत्थर के भगवान जैसे,
रो रही है वो कहीं अंदर से बहुत अंदर से
अब सायद वो भी उठ कर बोले
बांग्लादेश वाली मेरी माँ के जैसे
एक -एक कर के करो…
मेरी बेटी का बलात्कार…
वो माँ है न, कहाँ तक देख पायेगी
तड़प कर बोल ही तो जाएगी
सरक कर, मुंह को जरा सा ढांप जाएगी
अंदर कहीं बहुत अंदर तक काँप जाएगी
तुम बनते रहो भगवान,
मेरी कोई और सुनेगा,कोई और चिलयेगा
मेरी जुबान बन कर, मेरा दर्द बन कर
और कोई नही हुआ तो क्या… ?
इतिहास चिल्लायेगा,चीखेगा, रोयेगा
जो कालीखों से ही लिखा जायेगा
जिसे चाह कर भी न मिटाया जायेगा…
***
…सिद्धार्थ

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