कविता · Reading time: 1 minute

“बोझ”

साफ़ साफ़ कह दो,
जो रिश्ते बोझ लगने लगे,
यूं ढो रहे हैं हम जिसे।
अब खुशियों को जगह दो,
गमों ने छीन ली है जिसे।
आंखे कुछ इस तरह से खुल चुकी,
धोखे से बंद कर दी गईं थीं जिसे।

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PhD in Chemistry Worked as Prof at Engineering college
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