.
Skip to content

बोझ

प्रतीक सिंह बापना

प्रतीक सिंह बापना

कविता

November 30, 2016

वो जिन्हें तुम जानते हो
वो जिनसे तुम मिलते हो
वो भी अपने साथ ढोये हुए हैं
बोझ वो अपने साथ खींचते हुए
जहाँ से लड़ते हुए
जहाँ से इसके लिए लड़ते हुए

उनका हिस्सा भी है ये बोझ
जिस पर उनका बस भी नहीं
जिसे वो बदल न सकें
वो ऐसे ही हैं, बस ऐसे ही

वो बचना चाहें, वो झुकना चाहें
वो उसे दरकिनार करना चाहें
पर थक हार जाएं

रातों को जो उन्हें जगाये
रातों को जो नींद उड़ाये
साँसों को बोझिल कर जाये
आँखों को भिगाता जाये बोझ वो

ये लोग बुरा बनना ना चाहें
फिर भी खुद को बचा न पाएं
दूर भाग कर जाएं भी तो कहाँ जाएं
पहचान से इंकार कर जाएं
आँखें बंद कर लें वो
सोचे जग अँधा हुआ

आंखों में डाल आँखें
एक लकीर से खिंच दे
दर्द की वापसी की
जड़ों को ना सींचने दे

सांसें ले खुलकर
उस बोझ को उतार कर
खुले आसमान के तले
बेधड़क, आज़ाद

–प्रतीक

Author
प्रतीक सिंह बापना
मैं उदयपुर, राजस्थान से एक नवोदित लेखक हूँ। मुझे हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखना पसंद है। मैं बिट्स पिलानी से स्नातकोत्तर हूँ और नॉएडा में एक निजी संसथान में कार्यरत हूँ।
Recommended Posts
चुभ रहे जूते में वो मीलों चले जाते रातों में अक्सर वो वापस देर से आते करके मेहनत जो कमाते घर वो ले आते दर्द... Read more
तस्वीर तेरी नैनन में बसी, वो श्यामल बदन वो मोहक हँसी।
तस्वीर तेरी नैनन में बसी, वो श्यामल बदन वो मोहक हँसी। जिन्दगी बिन तुम्हारे अधूरी लगे आस हर पल मिलन की रही है लगी, दिन... Read more
कर यार बस
ज़ख्म दिए इतने उसने कहा अब तू कर यार बस ग़म जदा हो गए वो अब ग़म देकर गये वो यार बस तोहमत थी उनकी... Read more
ऊपर से चाहें तुम हँसते रहते हो
ऊपर से चाहें तुम हँसते रहते हो दर्द पता है अंदर अंदर गहते हो राह दिखाती माँ की बातें जीवन भर अगर सभी वो अपने... Read more