कविता · Reading time: 1 minute

बोझ एहसान का

झुक जाता हैं सिर इंसान का,
इतना वजन होता हैं एहशान का।

कद्र करता है वही इसका,
जो पक्का होता हैं ईमान का।

किसी ने मौका परस्त तो,
किसी ने एहशान फरामोश कहा।

किसी को क्या मालूम कि ,
मेरे दिल ने घुट घुट कर दर्द सहा।

मेरे मजबूरियों ने शायद,
कर दिए हैं खामोश मुझे।

मैं एक नेकदिल इंसान हूं,
मैं भी इतना बुरा नहीं ईमान का।

टूटा नही है अभी वास्ता,
इंसान से इंसान का।

आपको अभी मिल जाएँगे,
रूप इंसान में भगवान का।

झुक जाता हैं सिर इंसान का,
इतना वजन होता हैं एहशान का।

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