Jul 16, 2016 · कविता

बैठते न ठाले

समय सारा किया परिवार के हवाले
लिखें कुछ कैसे कभी बैठते न ठाले।
कभी चाय बनती, बनते परांठे थोड़े
हलवा गाजर का, कभी बनते पकोड़े।
सब्जियां बाज़ार से पड़ती है लानी
आकर फिर पड़ती फ्रिज में जमानी।
पोता कहे दादी मेरा स्वैटर तो बुन दो
बहू कहे अम्मा लो चावल ही बीन दो।
पोती कहे पेपर है, समास समझा दो
थोड़ा समय दादी मुझ पर लगा दो।
बेटा कहे माँ देशी घी हम लेकर आये
लड्डू बेसन के बने, तो मज़ा आ जाये।
पति बोले मक्का की रोटी बनाओ
सरसों का साग भी संग में खिलाओ।
लिखी न कविता, कथा न कोई कहानी
नाती-नातिन कहें, केक बना लो नानी।
समय सारा किया परिवार के हवाले
लिखें कुछ कैसे कभी बैठते न ठाले।

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poet and story writer
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