बेरुखी

खुशबू का पीछा करते करते,
वीराने में आ पहुंचे,
तेरी तृष्णा में हम न जाने,
कहाँ कहाँ हैं पहुंचे,
तूने छोड़ा जो मुँह मोड़ा,
तो क्या हुआ?
तेरी बेरुखी का सदका,
हम जर्रे से आफताब हुए,
आसमां तक पहुंचे,
तेरी हर ईंट को बना कर
पायदान,
मंजिल तक आ पहुंचे,
तू साथ हो या न हो,
नहीं है अब गिला,
हमें जहां पहुंचना था,
तेरे बिना भी पहुंचे!

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