बेमौसम बरसात

बेमौसम बरसात यह,
दिखा जाती है आइना अक्सर,
हर बार,बार-बार
सही क्यूँ केवल प्रकृति ही हो,
मनमर्ज़िया केवल मनुष्य ही क्यूँ करे,
क्यूँ न हो जाए क़ुदरत भी मानव जैसी,
सब कुछ करे और न माने अपनी कोई ग़लती,
हो जाए अहसानफ़रामोश,
कर दे सब कुछ विध्वंस,
और दोष दे केवल मनुष्य को,
लील जाए , दिखाए अपना रौद्र रूप,
काश ! कुछ तो करे मनुष्य जैसा,
विनाश करे,
कर दे समतल, हर आशा को,
और दे जवाब मानव की हर चोट का..

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कवयित्री हूँ या नहीं, नहीं जानती पर लिखती हूँ जो मन में आता है !!...
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