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बेटी

तेरे ज़ीस्त के गुलिस्ताँ में मेरी जाॅं कभी पतझड़ न आए
बसंत ही बसंत हो तितलियों सा उड़ना तू भूल न पाए

बदन के नाव में कभी कोई छेद न हो मन में कोई भेद न हो
दुनियां के समन्दर को साधने का हुनर तू कभी भूल न पाए
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय... लड़ने के लिए तलवार नही कलम को हथियार किया जाय थूक से इतिहास नही लिखा…
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