बेटी

एक नन्ही सी बच्ची
मेरे पेट पर लेट कर
नाचकूद कर
अपने छोटे भाई की
शिकायत का पुलिंदा लेकर
मुँह चिढ़ाते हुए
खिलखिलाते हुए
एक दिन अचानक
कद निकाल कर खड़ी हो गयी

अब वो डाँटने पर आँखे दिखाने लगी है
अपनी जिदें भी मनवाने लगी है
उसके फैसलों पर अब यही कहता हूँ-
कि सही है
क्योंकि वो अक्सर कह देती है कि
ये उसके पापा का घर है
मेरा नही है

वो डपट कर कह देती है
आप अपना खयाल नही रखते आजकल
उठिए, आज फिर आपने दवा नही ली है
खाना खाते ही सोना नही है
बैठिये, लेट कर टी वी नही

और मैं उसके बचपन को उलट पलट
कर सोचता हूँ
ये बड़ी कब हुई?
कल ही की तो बात है
ये बदमाश
मेरे पेट पर कूद रही थी
तुतलाते हुए

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