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बेटी

पं.संजीव शुक्ल

पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

कविता

February 12, 2018

………………………

बेटी से संसार है अपना
बेटी है बाबुल की गहना,
बीन बेटी घर आंगन सुना
कीलस रहा घर का हर कोना।

बेटी है हर सुख की डाली
बेटी कुल उपवन की माली,
बेटी से यह जीवन धन धन
बीन बेटी सुना है जीवन।

बेटी है वैतरणी धारा
माँ बापू के आंख का तारा,
दो कुल की पहचान है बेटी
बाबुल का सम्मान है बेटी।

बेटी से संसार सलोना
हरा भरा घर का हर कोना,
ईश्वर का प्रसाद है बेटी
ममता की पहचान है बेटी।

भरी कलाई वह भाई की
पाट रही दो कुल की खाई,
ममता की सौगात है बेटी
हरा भरा संसार है बेटी।

बेटी है दो कुल की रौनक
बेटी है ईश्वर की नेमत,
बीन बेटी ना वंश बढेगा
फिर कैसे संसार चलेगा।

हवनकुंड की अग्नि बेटी
देवालय में संख की ध्वनि,
बेटी हर खुशियों की जननी
मोक्षदायिनी वह बैतरणी।

बेटी सीता दुर्गा काली
बेटी को ना समझो गाली,
बेटी किरण, लता बन जाती
बाबुल को सम्मान दिलाती।

इस जग की उद्धारक बेटी
समाज दिशा सुधारक बेटी,
बेटी सुन्दर फूल की क्यारी
तभी तो लगती प्यारी-प्यारी।
…..
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”

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Author
पं.संजीव शुक्ल
From: नरकटियागंज (प.चम्पारण)
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।
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