बेटी

पढ़ लेती है वो मेरे दिल के भावों को
समझ लेती है मेरी उधेड़बुन को
निर्मल गंगा सी पवित्र है वो मन की
दर्द को जान लेती है एक पल में
तकलीफ को मेरी पहचान लेती है
जैसे वैद्य जान लेता है देख नाड़ी तन की

छल कपट क्या होता है, नहीं जानती वो
बस उड़ती रहती है सपनों की दुनिया में
बन चिड़िया नील गगन की
नहीं किसी से कुछ लेना उसको
बस वो खुश रहती है अपने में
समझ नहीं है उसे निगाहों के प्रश्न की

डर लगता है देखकर उसके भोलेपन को
दुनिया वाले तैयार बैठें हैं नोंचने को
बस खुशबु आनी चाहिए उन्हें कुँवारे बदन की
गुजरी थी इस दौर ऐ जवानी से मैं भी
पर वो वक़्त ऐ दौर कुछ ठीक था
लेकिन अब जरूरत है गहन चिंतन की

जवानी होती बेटी की माँ जो ठहरी
पल पल चिंता सताती रहती है मुझे
पल रही है मेरे पास तुलसी दूसरे आँगन की
“सुलक्षणा” दुश्मन हैं हर जगह उसके
जो कली को मसलना चाहते हैं खिलने से पहले
रक्षा करेंगे वो खुद ले ले शरण श्री कृष्ण की

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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