बेटी

बेटी
……
बेटी माँ के कलेजे का टुकड़ा
बार बार ये सुनती रहती हूँ मैं
उसी कलेजे के टुकड़े को तू
मैया काहे को मिटा देती है ।
मैं भी तो तेरी ही अंश हूँ माता,
फिर क्यों मैं परायी लगती हूँ।
भैया को कहती हो कुलचिराग,
मैं क्या अँधियारा करती हूँ ।
दो कुल का भार वहन करती हूँ,
दोनों कुल का मैं मान बढ़ाती हूँ।
तब भी मैं पूरा मान नहीं पाती हूँ ,
मैं पूरा सम्मान नहीं क्यों पाती हूँ ।
तू भी तो धरा तक न आने देती है,
जन्म से पूर्व ही दफन कर देती है ।
बोल क्या अपराध हुआ मुझसे है,
समाज भाई समान कहाँ मानता।
हर क्षेत्र में मैं बस पिसती रहती हूँ ,
सबकी नजरों में खटकती रहती हूँ ।
बेटी होना अभिशाप समान लगता ,
हमें जब माँ मान न पूरा मिलता है ।
समाज बने ये पुरुष प्रधान भले ही,
हमारे सम्मान हमें लौटा दे बस ये ।
बनी बेटियाँ वस्तु तुल्य क्यों माता ,
कहीं थोड़ा सा हाथ तेरा भी माता ।
सदियों से चली आ रही है कहानी ,
बस अब तू राह बदल कुछ अपनी।
डॉ. सरला सिंह।

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