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बेटी….

कन्या को जन्म दूँगी ….
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हाँ मैं कन्या को जन्म दूँगी
एक जीवन को खिलने दूँगी ….

कौन होते हो तुम निर्दयी
जो मेरी कोख का फैसला करोगे
बेटों की चाह ने अँधा किया
मैं तो मेरी नन्ही जान को पलने दूँगी …

जाने क्या दे दिया ऐसा बेटों ने
जो बेटी हो जायेगी तो छिन जायेगा
बेवज़ह बेटों के गुमान में फूले न समाते
‘माँ बनूँगी मैं’ कातिलों की न दाल गलने दूँगी …

स्त्री होने पे घिन तो तब होती है
जब एक स्त्री ही जन्मपूर्व ही मृत्यु देना चाहे
ऐसी निष्ठुर हृदया को पाषाण ही बना देते
हे प्रभु ! है इतनी शक्ति किसी की न चलने दूँगी ….

कौनसा वो वाचाल शास्त्र है
जिसने पुरुषों को शिरोधार्य कर
प्रकृति के सहज विकास को चुनौती दी
मेरी ममता को मैं न कभी छलने दूँगी …..

हाँ … मैं कन्या को जन्म दूँगी , दूँगी , दूँगी ….
…..
@डॉ. अनिता जैन ” विपुला “

Competition entry: "बेटियाँ" - काव्य प्रतियोगिता
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Author
Lecturer at college . Ph. D., NET, M. Phil. M. A. (Sanskrit , Hindi lit.) अंतर्मन के उद्गारों को काव्य रूप में साझा करना ।
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