बेटी

साल अठारह गुजरे जब से मेरे घर मे आई बेटी
जीवन की फुलवारी बनकर, घर आंगन मे छाई बेटी
महक उठी जीवन की बगिया नन्ही सी किलकारी से
पग पग पर सन्घर्ष भरे पल ,आशा बनकर छाई बेटी
दुनिया के मेले मे जब जब , कुछ रिश्तो की परख हुई
अनजानो की भीड मे अब भी , लगती नही पराई बेटी
जेठ दुपहरी से जीवन मे, नरम आन्च जब तेज हुई,
नीर भरी सुख की बदली सी, सावन बनकर आई बेटी
नया क्षितिज पाने को जब जब, घर से बेटी दूर हुई,
अमराईयों की तनहाई सी हर पल हर क्षण छाई बेटी
मां बाबा के सपने जब भी , बेटे होते चूर हुए
दीपशिखा सी बहन,बुआ और मां सी बनकर आई बेटी
बेटी बेटे में अंतर कर कुछ पाने की चाहत में
होता है अन्याय सा फिर भी करती नहीं लडाई बेटी
महीपाल सिंह

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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