.
Skip to content

बेटी

महीपाल सिंह जुगतावत

महीपाल सिंह जुगतावत

गज़ल/गीतिका

January 22, 2017

साल अठारह गुजरे जब से मेरे घर मे आई बेटी
जीवन की फुलवारी बनकर, घर आंगन मे छाई बेटी
महक उठी जीवन की बगिया नन्ही सी किलकारी से
पग पग पर सन्घर्ष भरे पल ,आशा बनकर छाई बेटी
दुनिया के मेले मे जब जब , कुछ रिश्तो की परख हुई
अनजानो की भीड मे अब भी , लगती नही पराई बेटी
जेठ दुपहरी से जीवन मे, नरम आन्च जब तेज हुई,
नीर भरी सुख की बदली सी, सावन बनकर आई बेटी
नया क्षितिज पाने को जब जब, घर से बेटी दूर हुई,
अमराईयों की तनहाई सी हर पल हर क्षण छाई बेटी
मां बाबा के सपने जब भी , बेटे होते चूर हुए
दीपशिखा सी बहन,बुआ और मां सी बनकर आई बेटी
बेटी बेटे में अंतर कर कुछ पाने की चाहत में
होता है अन्याय सा फिर भी करती नहीं लडाई बेटी
महीपाल सिंह

Author
महीपाल सिंह जुगतावत
42 महादेव नगर महामंदिर जोधपुर फोन न॰9950366321 एम॰ ए॰ (इतिहास ) शिक्षा स्नातक
Recommended Posts
बेटी
साल अठारह गुजरे जब से मेरे घर मे आई बेटी जीवन की फुलवारी बनकर, घर आंगन मे छाई बेटी महक उठी जीवन की बगिया नन्ही... Read more
आज भी बेटी कल भी बेटी
*हलचल बेटी* एक सवाल एक हल भी बेटी,, आज भी बेटी कल भी बेटी,, खामोशी इन लवो की बेटी,, और दिल की हलचल बेटी,, आसानी... Read more
बेटी है तो
घर, घर है गर घर में बेटी है बेटी है तो खेल हैं,खिलौने हैं मीठी-सी बोली है ढेर सारे सपने हैं हँसी है, ठिठोली है... Read more
कविता- बेटी
बेटी है स्वर्ग धरा का , मानव का है नन्दनवन । ेटी अंधविश्वास का अन्त है , बेटी है नव परिवर्तन । बेटी आधुनिकता का... Read more