बेटी

गम में न करती हूँ ,
फरियाद किसी से ,
नाकाम हसरतों में भी, जी लेती हूँ ।
दे दे कोई जहर का प्याला ,
ये कहकर कि प्यार है,
वो भी हंस कर पी लेती हूँ ।

अपार ममता को ,
अपने आँचल में समेटी हूँ ।
मत दुत्कारो मुझे,
न मारो मुझे ,
मै तुम्हारी ही नही,
कुदरत की भी एक “बेटी”हूँ ।

मुझसे ही बढेगा ये संसार तुम्हारा,
मर कर भी
निभा जाऊंगी प्यार तुम्हारा ।
दर्द का निवाला खा लेती हूँ ,
नफरत का जहर भी पी लेती हूँ,
दुखों की आग में,
जलते रहती हूँ ।
दरिंदगी भरी नजरे,
चुपचाप सहते रहती हूँ ।

कई रुप है मेरे ,
प्रेमिका बनकर,
अरमान सजा जाती हूँ ।
पत्नी बनकर ,
संसार सजा जाती हूँ ।
माँ बनकर ,
ममता बरसा जाती हूँ ।
जब तक रहती हूँ “बेटी”
भाई,बहन,घर बार सजा जाती हूँ ।

ज्वाला बनकर हूँ,
अग्नि पर भी लेटी ।
अपना कर तो देखो मुझे,
मै हूँ आपकी अपनी “बेटी”।।

” काजल सोनी “

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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