बेटी

जिस घर के आँगन में बेटी है वहाँ तुलसी की जरूरत नहीं,
देखो बेटी की सूरत से जुदा यहाँ किसी देवी की सूरत नहीं।

खुशियाँ पता पूछती हैं उस घर का जहाँ बेटियाँ रहती हैं,
बेटियों वाले घर से वो जन्नत भी ज्यादा खूबसूरत नहीं।

रिश्तों की नजाकत बेटियों से बेहतर कोई नहीं समझता,
आज की बेटी, कल की माँ जैसी जगत में कोई मूरत नहीं।

दौलत बाँटते हैं बेटे, दुःख को खुशियों में बदलती है बेटियाँ,
बेटी के हाथों से कार्य की शुरुआत से बढ़कर शुभ मुहूर्त नहीं।

बहुत खुशकिस्मत है “सुलक्षणा” जो एक बेटी की माँ बनी,
जो करती है बेटी से नफरत, मेरी नजर में वो औरत नहीं।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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