बेटी है तो

घर, घर है
गर
घर में बेटी है
बेटी है तो
खेल हैं,खिलौने हैं
मीठी-सी बोली है
ढेर सारे सपने हैं
हँसी है, ठिठोली है
बेटी है तो
गुड्डे हैं, गुड़िया है
रोज इनकी शादी है
बेटी का होना ही
सच्ची आजादी है
बेटी है तो
घर में बहार है
तीज है, त्यौहार है
ढेर सारी खुशियां हैं
रिश्तों में प्यार है
बेटी है तो
जीवन का
हर दिन मधुमास है
बेटी से ही मुझे अपने
पितृत्व का अहसास है
बेटी से ही घर मेरा
घर जैसा बना है
मैं हूँ खुशकिस्मत
मेरी बेटी चेतना है।

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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