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बेटी मोसमी बुखार है

Rakhi Tiwari

Rakhi Tiwari

कविता

January 18, 2017

हो रही आज भी भ्रूण हत्या
बेटा होने से मन में अहंकार है,
बेटी होने से हंसता सिर्फ आधा मन
बेटियों से तो मौसमी प्यार है।

बेटी सहती दो कुल का भार
हर रोज सजाती हैं घर द्वार,
फिर भी हिस्से है थोड़ा दुलार
बेटियों से तो है मौसमी प्यार।

कुल का दीपक जनने वाली
कुल दीपिका कभी ना कहलाती,
होती निराश जब सुनतीं हैं कि
अंतिम समय मैं,मात-पिता को,स्वर्ग भी ना दे पातीं।

बेटी का होता है अपना मन
जिस में बसाए लाखों उलझन,
कशमकश में जी रही हैं
बेटे सा ना होने का दर्द सह रही हैं।

मैं भी बैटी हूं डरती हूं,
झिझकती हूं,
बेटे सा बनने की चाह में कहीं
मैं अपने स्त्री होने के अस्तित्व को ना खो बैठूं।

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Author
Rakhi Tiwari
Here I am ,biology student preparing for the ug medical courses ,lives in Indore (M.P.), and one of my hobby is to convert the emotions, feelings, seen or unseen reality into lines or paragraph and this only I do to... Read more

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