बेटी मोसमी बुखार है

हो रही आज भी भ्रूण हत्या
बेटा होने से मन में अहंकार है,
बेटी होने से हंसता सिर्फ आधा मन
बेटियों से तो मौसमी प्यार है।

बेटी सहती दो कुल का भार
हर रोज सजाती हैं घर द्वार,
फिर भी हिस्से है थोड़ा दुलार
बेटियों से तो है मौसमी प्यार।

कुल का दीपक जनने वाली
कुल दीपिका कभी ना कहलाती,
होती निराश जब सुनतीं हैं कि
अंतिम समय मैं,मात-पिता को,स्वर्ग भी ना दे पातीं।

बेटी का होता है अपना मन
जिस में बसाए लाखों उलझन,
कशमकश में जी रही हैं
बेटे सा ना होने का दर्द सह रही हैं।

मैं भी बैटी हूं डरती हूं,
झिझकती हूं,
बेटे सा बनने की चाह में कहीं
मैं अपने स्त्री होने के अस्तित्व को ना खो बैठूं।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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