बेटी बिना आँगन सूना लगता है

कितना भी बड़ा हो, चन्दा बिना आकाश सूना लगता है
कितने भी फूल हों, बेटी बिना आँगन सूना लगता है

बेटी नहीं है बोझ ये तो होती है गुमान परिवार का
इनका सम्मान बताता क्या है मुकाम सभ्यता का
होने लगे चीर हरण जाने गर्त में वो समाज लगता है
कितने भी फूल हों, बेटी बिना आँगन सूना लगता है

दर्द कोई इनके जितना सह जाए सम्भव नहीं है
अपना घर छोड़ अनजान घर बसाना आसान नहीं है
कलेजा भर आता है जब हाथ बाबुल का फिसलता है
कितने भी फूल हों, बेटी बिना आँगन सूना लगता है

लेकर ही क्या जाती हैं बेटियाँ सोचो इस समाज से
फिर क्यों मार देते हैं लोग बेटियों को लोक लाज से
कोख अपनी उजाड़ते क्यों नहीं माँ का दिल पिघलता है
कितने भी फूल हों, बेटी बिना आँगन सूना लगता है

कितना भी बड़ा हो, चन्दा बिना आकाश सूना लगता है
कितने भी फूल हों, बेटी बिना आँगन सूना लगता है

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 566

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 3.9k

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share