कविता · Reading time: 1 minute

बेटी बचाओ, बेटी पढाओ

शबनम की बूंदों का दर्पण
स्नेह की निर्मल धारा-सी।
घर के आंगन की फुलवारी
बेटी भोर का तारा-सी।

अपना भाग्य लिखवा कर आती
सुख-दुख का एक सहारा-सी।
दो-दो कुलों को रोशन करती
बेटी नभ का तारा-सी।

माँ के काम में हाथ बंटाए
बाबा की आँख का तारा-सी।
पढ़&लिख कर पहचान बनाती
बेटी, मीरा का इकतारा-सी।

कभी नहीं जिद्द पर अड़ती
संतोषी और संयम अपारा-सी।
बोझ नहीं है माँ-बाप पर
बेटी, सौभाग्य का सितारा-सी।

अगर बेटा है कुलदीपक तो
बेटी भी है भाग्य सरूपा-सी।
पढ-लिखकर एक दिन बनेगी
मदर टेरेसा और कल्पना चावला-सी।

बेटी बचाओ, बेटी पढाओ
मोदी जी का यह है नारा भी।
बेटी बचेगी तभी बहू मिलेगी
यह भूल रहा जग सारा-जी।

विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

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