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बेटी-छंद मुक्त कविता

DrRaghunath Mishr

DrRaghunath Mishr

कविता

January 2, 2017

घर
परिवार
माता-पिता
दो-दो घरों की
रौनक
होती है बेटी.

समाज की शान
देश का उत्थान
परिवार का अभिमान
ख़ुद में खानदान
धरती-आससमान
कुटुंब की आन
घर की पहिचान
श्रृष्टि का अवदान
होती है बेटी.

आँखों का नूर
रिवाज-दस्तूर
सबकी ख़ुशी में खुश
सबके ग़मों से चूर
स्वार्थ से दूर
अन्याय पर क्रूर
समाज में मजबूर
होती है बेटी.

रोको ये सितम
बढाओ मत तम

करो नहीं वहम
छोडो अब अहम
आने दो उसको
जीने दो उसको
बेटों से नहीं कम
होती है बेटी.

संसार नहीं होगा
संस्कार नहीं होगा
बिना बेटियों के
उद्धार नहीं होगा
बेटी के बिना श्रृष्टि नहीं होती
बेटी के बिना दृष्टि नहीं होती
बेटी के बिना प्रकृति नहीं होती
बेटी में गन्दी प्रवृत्ति नहीं होती
पर्याय सही मान का
होती है बेटी.
@डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता/साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

Author
DrRaghunath Mishr
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच ले तू किधर जा रहा है 2.प्राण-पखेरू उपरोक्त सहित 25 सामूहिक काव्य संकलनों में शामिल
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