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बेटी के अंतर्मन की व्यथा

sudha thakur

sudha thakur

कविता

January 24, 2017

कल तक मैं एक अंश मात्र थी,पर आज साकार हूँ, आकर इस दुनिया में और देख के इसके रंग, मैं दुविधा में पड़ गयी हूँ और यह सोचने को मजबूर हो गयी हूँ
मैं क्या हूँ ,क्यों हूँ और क्या है मेरा अस्तित्व
यह विचारने के लिए मैं आज अपनी यात्रा पर शुरू से निकल पड़ी
पहले थी मैं इस शुन्य अनंत में विरचती हुई, धीरे धीरे मेरा अंकुरण हुआ फिर आकृति बनी, मैं माँ के भीतर ही धूप, हवा, पानी, खुशबू सब कुछ महसूस करती और अपने आप को सुरक्षित समझती, धीरे धीरे यह सुहानी दुनिया मुझे आकर्षित करने लगी और मैं जल्दी जल्दी इस नयी दुनिया में आने के सपने देखने लगी, इंतजार की बेला समाप्त हुई, आखिर वो दिन आ गया जब मैने इस रंग बिरंगी दुनिया में आँखें खोली, मैं बहुत खुश थी, सबसे मिलना चाहती थी , पर इस जहाँ में लाने वाली माँ की बाहों में झूलकर सबसे पहले शुक्रिया कहना चाहती थी, पर यह क्या मेरे आने पर मेरी माँ की आँख में आंसू और चेहरे पर कोई ख़ुशी नहीं, मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी, अंजानी सी घबराई हुई सी सबके चेहरे को निहार रही थी कि शायद ख़ुशी से कोई मुझे गले लगा ले, पर मेरे आने से कोई खुश नहीं था क्योंकि मैं एक लड़की थी, पर क्या यही मेरा कसूर है, मैं यही सोच रही थी कि माँ मैं तुम्हारा अंश थी, जब मैं शरारतें करती तब तुम मुझे सिर्फ महसूस कर ख़ुशी से फ़ूली न समाती और मेरे आने का पल पल इन्तजार करती थीं, आखिर जब इन्तजार की बेला समाप्त हुई तो सबके चेहरों की ख़ुशी दुःख में बदल गयी, आखिर क्यों…, मैं यह सब जानने की कोशिश कर रही थी कि तभी मेरी दादी माँ आयी, मैं उन्हें देख कर बहुत खुश थीऔर चाहती थी की जल्द ही उनकी बाहों में झूलूँ, पर यह क्या मुझे देखते ही उनके चेहरे की रंगत उड़ गयी ,और बोली लो बढ़ गया एक और बोझ, उन्होंने तो जैसे नामकरण से पहले मेरा नाम रख दिया हो और वो भी बोझ, मैं बहुत उदास हो गयी थी, और कुछ समझ न पा रही थी, अपना ध्यान दिलाने के लिए बस रोये जा रही थी रोये जा रही थी, कि तभी माँ ने डाँट लगायी, कितना रोये जा रही है, माँ तुम अपने अंश को ही न समझ पायी, मैं तो यह बता रही थी कि मैं बोझ नहीं तुम्हारी छाया हूँ , तुम्हारे आँखों के आंसू नहीं ज्योति हूँ, होती नहीं बेटियाँ बोझ ये तो जीवन का आधार है, जीवनदायिनी ये तो शक्ति का अवतार है, जरूरत है सोच बदलने की, नारी तिरस्कार मिटाना है,तोड़ कर बंदिशों की जंज़ीरें , आगे कदम बढ़ाना है, बेटा- बेटी के अंतर को मिटाना है।

Author
sudha thakur
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