बेटी की चिट्ठी

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एक बिटिया लिखने बैठी चिट्ठी,
याद आई घर-आँगन की मिट्टी।

माँ की ममता,स्नेहिल-सी गोदी,
पापा की प्यार से भरी थपकी।
दादा – दादी की थी लाड़ली,
भाई-बहन की प्यार भरी झप्पी।
वो सखी-सहेली,स्कूल की छुट्टी,
लड़ना,झगड़ना,हो जाना कट्टी।

एक बिटिया लिखने बैठी चिट्ठी,
याद आई घर-आँगन की मिट्टी।

विदा होकर ससुराल है आयी,
नए रिश्ते,नई पिया की नगरी।
साथ ले आई यादों की गठरी,
सिखा-समझा,संस्कार की पेटी।
एक क्षण में कैसे हो गई बड़ी,
कल थी जो छोटी-सी बच्ची।

एक बिटिया लिखने बैठी चिट्ठी,
याद आई घर आँगन की मिट्टी।

नई-नई दुनिया है स्वप्निल-सी,
आँखें नम आज संग माँ नहीं।
गुड्डा-गुड़िया वहीं कहीं पड़ी,
सामने है जिम्मेदारी खड़ी।
पापा के पलकों में पली बढ़ी,
कितनी थी अपने घर पर जिद्दी।

एक बिटिया लिखने बैठी चिट्ठी,
याद आई घर-आँगन की मिट्टी।
????—लक्ष्मी सिंह

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