कविता · Reading time: 1 minute

बेटी का दर्द-अपना समझती हूँ मैं

बेटी का दर्द-अपना समझती हूँ मैं
सुशील शर्मा

रोपित किया तुमने मुझे पुत्र की चाह में।
फिर भी तुम्हारे अनचाहे प्यार को अपना समझती हूँ मैं।
पीला जर्द बचपन स्याह बन कर गुजर गया।
माँ के सशंकित प्यार को अपना समझती हूँ मैं।
अपने हिस्से का भी उसको छुप कर खिलाया था।
उस भाई की बेरहम मार को अपना समझती हूँ मैं।
कर दिया विदा मुझे अपने घर से अनजान के साथ।
उस अजनबी घर के बुरे व्यवहार को अपना समझती हूँ मैं।
जिसे छाती से चिपका कर अपना लहू पिलाया था।
उस पुत्र दुत्कार को अपना समझती हूँ मैं ।
कभी यशोधरा कभी सीता कभी मीरा सी ठुकराई।
सभी बुद्धों ,सभी रामों सभी गैरों को अपना समझती हूँ मैं ।
चाह कर भी न कर सकी प्रतिरोध इन सबका।
सभी अन्यायों आक्रोशों को अपना समझती हूँ मैं।
देह के रास्ते से गुजरे सभी रिश्ते।
हर रिश्ते से उभरे घाव को अपना समझती हूँ मैं।
सामाजिक दायरों में जहाँ रिश्ते सिसकते हों।
उस डरी ,सहमी ,सुबकती औरत को अपना समझती हूँ मैं।

1 Like · 118 Views
Like
10 Posts · 926 Views
You may also like:
Loading...