कविता · Reading time: 1 minute

बेटी का अरमान

बेटी को कब किसने पहचाना है,
ईश्वर का वरदान कहां माना है,
जन्म लेकर जिसने माता पिता का सर झुकाया है,
कल उसी ने नेक कामों से उस झुकते सर को उठाया है।

नमी न रहने देती वह कभी किसी की आंखों में,
हंस कर सह लेती है जो कहता यह संसार है,
बेटे की चाहत में क्यों बचपन बेटी का खो जाए,
दुनिया के अपमानों से उसका मन मुरझा जाए।

हंसकर पूछ रही ईश्वर से क्या मैं ही तेरा वरदान रे,
दे ईश्वर इतनी शक्ति मुझे रह पाऊंगी संसार में,
जो ना चाहे बेटी उनको भी सह पाऊ,
अपने होने का मूल्य सभी को मैं समझा पाऊं।

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