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बेटी आई घर-आँगन महकाई

सरस्वती कुमारी

सरस्वती कुमारी

कविता

April 2, 2017

बेटी आई घर-आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

सागर की मोती जैसी
दीया की बाती जैसी
जगमगाती ज्योति आई
बेटी आई घर -आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

पिता की दुलारी है
माँ की प्यारी है
सबकी राजदुलारी आई
बेटी आई घर -आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

कुल दीपक कुल की शान है
दोनों कुल की रखती मान है
मरूभूमि में फूल खिलाती आई
बेटी आई घर -आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

सागर सी गहराई है
इरादा भी फौलादी है
छूने आसमान आई
बेटी आई घर- आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

चाँद तारे मुट्ठी में लाई
सूरज सा चमक लाई
रचने नया इतिहास आई
बेटी आई घर -आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

युगों युगों की कहानी है
प्रीत इसकी पुरानी है
सबकी आँखों में पानी लाई
बेटी आई घर-आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई

माँ भारती की बेटी है
राष्ट्र की नव-निर्मात्री है
अमिट छाप छोड़ने आई
बेटी आई घर -आँगन महकाई
खिलखिलाती धूप सी आई ।

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Author
सरस्वती कुमारी
सरस्वती कुमारी (शिक्षिका )ईटानगर , पोस्ट -ईटानगर, जिला -पापुमपारे (अरूणाचल प्रदेश ),पिन -791111.

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